ईश्वर की रचना इंसान ने की , दरसल ईश्वर होता ही नही,होता तो दिखता! आज तक किसी भी व्यक्ति ने साक्षात यानी 2 पैर 2 हाथ 2 आँख सहित ऐसा कोई सर्वशक्तिमान नही देखा जिसे ईश्वर कहा जा सके,न ही कोई आधुनिक मशीन ने ईश्वर के अस्तित्व को डिटेक्ट किया है । ऐसे कोई सबूत है नही जो सिद्ध कर सके कि ईश्वर है। अब मुख्य सवाल यह है कि फिर ईश्वर की अवधारणा कैसे आ गयी और इतनी ज्यादा क्यों पॉपुलर हुई जबकि इतना तो कोई आधुनिक तकनीकी भी पॉपुलर नही हो पाई है ! इसे समझने चलते है इसके पीछे के इतिहास में! इस दुनिया मे जब मानव का।विकास हुआ ( मानव का विकास ही हुआ है मनुष्य कभी मनुष्य ही पैदा नही हुआ था जैसा कि धार्मिक ग्रंथो में बताया गया है) तब वह उतने विकसित दिमाग के साथ अस्तित्व में नही था ,उसके विकास की प्रक्रिया निरन्तर चालू थी, आज भी चालू है विकाश एक न खत्म होने वाली प्रक्रिया है ! उस दौर में प्रकृति में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं जैसे वर्षा, तूफान,भूकंप,ज्वालामुखी,बिजली आदि घटित होने का उचित कारण पता नही था और वह इन घटनाओं से अनसिक्योर्ड हुआ करता था, और हमेशा से ही इन घटनाओं के डर से आशंकित हुआ करता था! तब उन्हें स्वमेव यह महसूस हुआ कि इन घटनाओं के पीछे किसी का हाथ है लेकिन वह व्यक्ति अदृश्य है बस उसी अदृश्य शक्ति के डर से बाहर निकलने के लिए उसे मनाने के लिए पूजा पाठ का चलन चालू हुआ ,उसी दौरान अन्य दृश्य शक्तियां जैसे सूर्य,वायु , जल आदि की भी पूजा चालू हो गयी,सदियों तक इनकी ही पूजा होते आई, धीरे धीरे इंसान कबीलो के बड़े होने के साथ ही बड़े बड़े राज्यो में रहने लगा । अब राज्यो के अस्तित्व में आने के साथ ही बहुत सारी चीजे व्यवस्थित कार्यप्रणाली के अनुसार होने लगी जैसे प्रशासन,नीतियां,मनोरंजन,व्यापार,आदि आदि! इसी दौरान घटनाओं के घटित होने के उचित कारण पता नही होने से अंधविश्वास के कारण नए नए ईश्वर जन्म लेने लगे जो कि काल्पनिक घटनाये मात्र थी किसी व्यक्ति ने देखा नही था,परंतु राजा महाराजाओं को प्रसन्न करने और ज्यादा धन के लालच में उनके कवियों/चारणों/भाटों ने उनकी अतिशयोक्तिपूर्ण प्रसंशा की,उन्हें शक्तिशाली बताया और इस तरह उस राजा को एक अदृश्य ईश्वर के समतुल्य माना ,कालांतर में मनोरंजन के लिए और राजा की अतिशयोक्ति के ये ग्रंथ यानी पौराणिक ग्रंथ को इतिहास की तरह और हर बार नए तरीके से बखान करने लिखने के क्रम में कई परिवर्तन आये और अंततः उसी झूठ को बिना लॉजिक लगाए आज हम अन्धविश्वास के सर्वोच्च रूप को ईश्वर कहते है । ईश्वर को आदिमानव काल मे केवल हवा, पानी,बिजली,सूर्य,चंद्रमा,आदि के रूप में माना जाता था,आधुनिक ईश्वर की उत्पति मानव विकास के आधुनिक इतिहास काल के दौरान हुई है जब कुछ चालक लोगो द्वारा मनोरंजन के लिए लिखे गए और अपने राजा की अतिशयोक्तिपूर्ण शक्तियों वाले ग्रंथो को इतिहास बताने की कोशिश शुरू हुई और यह वही दौर है जब नए नए ईश्वर अस्तित्त्व में आये! जबकि आज के दौर में घटना के पीछे का कारण विज्ञान की उन्नत तकनीक से स्पष्ट किया जा रहा है और निरंतर खोज चालू है,बहुतो के जबाब मिल गए अनेको के जबाब बाकी है…खोजे चलती रहेंगी, जिस तरह विज्ञान की हर थ्योरी को 100% हर पहलू से परखने / परीक्षा से गुजरने के बाद रिजल्ट के रूप में सत्य प्राप्त होता है ,ठीक वैसे ही जैसे जैसे शिक्षा का लेवल / तकनीकी/विज्ञान प्रगति करते जाएगा,विज्ञान ईश्वर और झूठे धर्म के पुलिंदों ( धर्म ग्रंथो) का अस्तित्व खत्म होते जाएगा!
✍ लेखक: राजेश बकोड़े
आस्था ही अन्धविश्वास की जननी है ।
ReplyDeleteऔर अन्धविश्वास ही भगवान ।
विज्ञान सिद्ध करता है
भगवान को सिद्ध नही किया जा सकता और बिना सिद्ध किये जाने समझे बिना तर्क के मान लेना अन्धविश्वास ही तो है ।
सही कहा आपने
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